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मेरा गांव कैसा है

गाव भी अब गाव कहां है, डसती वहां तन्हाई है आपस की वैमनष्यता  ने, बदली वहां की हवा ही है  |  बीघे वहां पर  ज्यादा है, पर नहीं कोई संबाई  है  जब भी जाते सुबह पखाने , चलने में दिक्कत आई  है   गांव के लोगो ने देखो, मेड़  वहां की खाई है  |  अब रस्सी के गए जमाने, मैट्रेस ने जगह बनाई है। अब कौन है खाता दूध महेरी, अड्डे पर बैठा पवन हलवाई है सुबह की बढ़ई और समोसा, शाम को पेटीज़ बनवाई हैं भैया आप ना पीते होंगे इतनी, गांव में कोल्ड ड्रिंक खुल जाती है |  आधे से ज्यादा बुजुर्ग हमारे, लेते ना राम राम बेचारे करते हैं व्यवहार है ऐसे, जैसे हैं ये सभी पराए दादी माँ तो है, ही नहीं अब, वो कहानी है नहीं अब  दुलार लाड सब खो गया, वहां पर भी अब सब धोखा है |  झोपड़ी अब खो सी गई है, जगह वहां भी महलों ने ली है कहां वहां चौपाल रहे अब, एक एक इंच पर मर रहे सब जगह निकलने की नहीं देंगे, कुछ भी कहा तो चीर भी देंगे ऐसे ऐसे शब्द है अब, गाव नहीं वो आधे शहर है अब |  अपनी  इक्षा मार चुका हूं, अपने आप को ढाल चुका हूं  रहो गांव से दूर...