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ए ज़िंदगी थोड़ा सा आराम का हक़दार में भी हूँ,

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  ए ज़िंदगी थोड़ा सा आराम का हक़दार में भी हूँ, थोड़ा विश्राम का हक़दार में भी हूँ। साँसों की डोरी को महसूस न करता हूँ, हर वक़्त में बेहोश सा रहता हूँ, हर वक़्त में खामोश सा रहता हूँ। इस ज़माने की चिंता ने इतना है, सताया कि, अब दिन रात उलझा सा हूँ, रहता । एक बार मुझे भी तो मौक़ा देना कुछ करने का, सबके लिए नहीं अपने लिए करने का। कब तक मैं यूँही खामोश रहूँ? ए ज़िंदगी थोड़ा सा आराम का हक़दार में भी हूँ। थोड़ा विश्राम का हक़दार में भी हूँ। सावन की झूले आज क्यों नहीं दिखते, वो बचपन के चूरन अब क्यों नहीं बिकते। क्यों अब वो चिड़ियों की चहचाहत से न जगते हैं, क्यों वो सुबह का सूरज लमिमा दिए न दिखता है, क्यों वो सांझ का डूबता सूरज न निहरता है। रात के तारे गिनते सोना वो चाँद को मामा कहना, क्यों अब वो वक़्त आना रहा है, मैं अभी भी बचपन चाहता हूँ। ए ज़िंदगी थोड़ा सा आराम का हक़दार में भी हूँ। थोड़ा विश्राम का हक़दार में भी हूँ। अब सिर्फ़ एसी की सरसराहट है, अब सिर्फ़ पंखे की फ़रफ़राहट है। ऐसा नहीं कि वक़्त है, बदला , ऐसा नहीं कि सिर्फ़ मुक़द्दर  है, बदला। बदले है रंग ज़माने ने भी, बड़े और बुज...