ए ज़िंदगी थोड़ा सा आराम का हक़दार में भी हूँ,


 

ए ज़िंदगी थोड़ा सा आराम का हक़दार में भी हूँ,

थोड़ा विश्राम का हक़दार में भी हूँ।


साँसों की डोरी को महसूस न करता हूँ,
हर वक़्त में बेहोश सा रहता हूँ,
हर वक़्त में खामोश सा रहता हूँ।
इस ज़माने की चिंता ने इतना है, सताया
कि, अब दिन रात उलझा सा हूँ, रहता ।
एक बार मुझे भी तो मौक़ा देना कुछ करने का,
सबके लिए नहीं अपने लिए करने का।

कब तक मैं यूँही खामोश रहूँ?

ए ज़िंदगी थोड़ा सा आराम का हक़दार में भी हूँ।

थोड़ा विश्राम का हक़दार में भी हूँ।


सावन की झूले आज क्यों नहीं दिखते,
वो बचपन के चूरन अब क्यों नहीं बिकते।
क्यों अब वो चिड़ियों की चहचाहत से न जगते हैं,
क्यों वो सुबह का सूरज लमिमा दिए न दिखता है,
क्यों वो सांझ का डूबता सूरज न निहरता है।
रात के तारे गिनते सोना वो चाँद को मामा कहना,
क्यों अब वो वक़्त आना रहा है,
मैं अभी भी बचपन चाहता हूँ।


ए ज़िंदगी थोड़ा सा आराम का हक़दार में भी हूँ।

थोड़ा विश्राम का हक़दार में भी हूँ।


अब सिर्फ़ एसी की सरसराहट है,
अब सिर्फ़ पंखे की फ़रफ़राहट है।
ऐसा नहीं कि वक़्त है, बदला ,
ऐसा नहीं कि सिर्फ़ मुक़द्दर  है, बदला।
बदले है रंग ज़माने ने भी,
बड़े और बुज़ुर्ग भी
पर शिकायत करूँ तो किस से करूँ,
ये सोचकर मन मार बैठा हूँ।

ए ज़िंदगी थोड़ा सा आराम का हक़दार में भी हूँ।


फितरत ही ऐसी थी मेरी में सबके लिए जीया
मैं खुद घुटता रहा, मगर सबको ख़ुशी दिया।
सुनकर उपनिषद की बातें,
मैं सिर्फ़ चर्वेति चर्वेति रहा।
भविष्य के अँधेरे को उजाला समझकर,
जो होता गया, मैं करता गया।
क्या पाप क्या पुण्य, कुछ भी तो न सोचा,
जो मिला सबको हड़पता  गया।
जब देखा है मुड़कर के पीछे,
शिवाय छालों के कुछ न मिला।
अब समझ आया किया था प्रैंक मैंने खुद के साथ
अब सबको अपने ऊपर हँसता हूँ, देखता हूँ।

ए ज़िंदगी थोड़ा सा आराम का हक़दार में भी तो हूँ।


खुद में खो जाऊं ऐसी दुनिया है चहिए,
मिल लूँ एक बार खुद से वह समय चहिए।
जो हुआ, होगा, उसकी फिक्र न हो मुझको,
बस मैं,  मेरा, मुझमें, होना ही चहिए।
एक बार मिल जाऊं मैं खुद से,
फिर आगे का कदम सोचता हूँ।


ए ज़िंदगी थोड़ा सा आराम का हक़दार में भी हूँ,

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