शादी की सालग्रह

 तन्नू आज सुबह से ही चहक रही थी। उसके कदम रोज़ से कुछ ज्यादा ही हल्के लग रहे थे। वह कुछ गुनगुना रही थी और अपने काम में भी कुछ ज्यादा ही मन लगा रही थी। अभी सुबह का सूरज भी पूरी तरह नहीं उगा था, मगर उसकी हल्की-हल्की लाली ज़मीन पर फैल रही थी। उधर तन्नू के मन के अंदर भी एक तरह का संगीत बज रहा था, जैसे मन का संगीत और भोर की रोशनी आपस में मिल रहे हों। जैसे समुद्र का ज्वार-भाटा अचानक शांत हो गया हो।

तन्नू को ऐसा लग रहा था जैसे सपनों की खिड़की पर प्यार की हवा ने दस्तक दे दी हो और कह रही हो, "आज तुम बहुत खुश हो, मुझे भी बताओ, क्या हुआ है।" ये सब उसके मन के ताने-बाने थे। कभी-कभी तन्नू अपना फोन उठाती और सोचती, "अभी तो चिराग जी सो रहे होंगे, थोड़ी देर में कॉल करते हैं," लेकिन फिर काम में लग जाती। पर थोड़ी देर बाद फिर से फोन के पास आकर देखती और सोचती, "अभी नहीं।" बस, ऐसे ही उलझन में समय बीत रहा था।

दरअसल आज का दिन उनके लिए खास था। तन्नू और चिराग की शादी की सालगिरह थी। चिराग एक प्राइवेट कंपनी में छोटी सी नौकरी करता था। वह महीने में सिर्फ दो दिन गांव आता और सभी से मिलकर चला जाता। तन्नू को उन दो दिनों के लिए पूरे महीने इंतजार करना पड़ता। ऐसा नहीं था कि तन्नू का मन साथ जाने का नहीं करता, मगर घर के हालात और चिराग की नौकरी के बीच तालमेल बैठाना मुश्किल था। इसलिए तन्नू ने तय किया था कि वह घर पर रहेगी और चिराग अपनी नौकरी करेगा।

छोटे परिवार में अक्सर लड़की तो आ जाती है, मगर पति के साथ रहने का सपना अक्सर सपना ही बनकर रह जाता है। क्योंकि मिडिल क्लास परिवार जब शादी करता है, तो अक्सर कर्ज़ लेकर ही करता है। और शादी के बाद उस कर्ज़ को चुकाने के लिए पूरा घर दिन-रात एक कर देता है। सभी मिलकर मेहनत करते हैं ताकि कर्ज़ उतारा जा सके।

इसी वजह से कभी-कभी नई-नवेली दुल्हन, जिसे घर में आए अभी कुछ ही समय हुआ होता है, अपने पति के बिना ही घर में रह जाती है। लड़का उसे घर पर छोड़कर पैसे कमाने के लिए शहर चला जाता है, क्योंकि गांव में रोज़गार के साधन नहीं होते।

ख़ैर, वैसे तो चिराग को 8 दिन पहले ही आना था, मगर सालगिरह के दिन घर आने का फैसला लिया। यही तन्नू भी चाहती थी। तन्नू अपने ससुराल में सबकी प्यारी थी, लेकिन पति का स्थान तो कोई नहीं ले सकता। तन्नू और चिराग दोनों फोन पर घंटों बात करते। उनकी ये मीठी-मीठी बातें एक-दूसरे के दिल के दर्द को थोड़ा सुकून दे देती थीं। कहते हैं, कुछ लोग साथ रहकर भी दर्द देते हैं, और कुछ लोग दूर रहकर भी मरहम लगा देते हैं। उनका साथ भी कुछ ऐसा ही था।

सुबह धीरे-धीरे बीत रही थी। तन्नू ने आखिरकार फोन मिलाया, मगर चिराग ने फोन नहीं उठाया। वह सोचने लगी, शायद सो रहे होंगे। दिन चढ़ने लगा और तन्नू अपने काम में लग गई, मगर उसका मन बार-बार फोन की तरफ जा रहा था। फोन उठाया नहीं गया, तो तन्नू के मन में सवाल उठने लगे, "क्या हुआ? आज तक तो खुद ही बधाई देते थे। अब फोन क्यों नहीं उठा रहे?"

सासू मां ने आवाज़ दी, "बहू, फोन बाद में देखना, ये काम जल्दी पूरा कर लो। आज कथा है।" तन्नू काम में लग गई। वह जानती थी कि गांव की बहुओं को पर्दा करना होता है और सवाल-जवाब कम करना चाहिए।

कथा खत्म हो गई, मगर तन्नू का ध्यान फोन पर ही था। उसने फिर से फोन मिलाया। इस बार चिराग ने फोन उठाया और कहा, "तन्नू, मैं अभी बिजी हूं, थोड़ी देर में कॉल करता हूं।" तन्नू का दिल बैठ गया। सोचने लगी, "पहले तो ऐसा कभी नहीं हुआ। आखिर क्या बात है?"

दिन ढलने लगा, और तन्नू मायूस होकर घर के कामों में लग गई। तभी अचानक गेट पर दस्तक हुई। तन्नू सोचने लगी, शायद हवा है, जो बार-बार परेशान कर रही है। सासू मां ने कहा, बहू, देखो गेट पर कौन है। अपने सिर को दुपट्टे से ढका और गेट की तरफ चल दी, और उसने नीचे की तरफ सर करके गेट खोला और वापस मुड़कर अंदर जाने लगी | जैसे ही तन्नू मुड़ी तो पीछे से एक दबी हुयी और बड़ी प्यार भरी आवाज आई “हैप्पी मैरिज एनिवर्सरी, तन्नू!"

तन्नू जैसे ही सुना धीरे से अपना सर ऊपर किया और परदे में से ही सामने देखा तो पाया की सामने चिराग खड़ा था। तन्नू की खुशी का ठिकाना न रहा। उसका दिल चाहा कि वह दौड़कर चिराग से लिपट जाए, मगर लोकलाज का पर्दा बीच में आ गया। दोनों कुछ देर तक एक-दूसरे को देखते रहे। तन्नू को ऐसा लग रहा था जैसे उसकी पूरी दुनिया उसके सामने खड़ी हो। तन्नू की तो खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा, ऐसा लगा जैसे झपट करके चिराग से लिपट जाऊं और उसमें समा जाऊं, मगर फिर लोक-लाज का पर्दा बीच में आ गया। तन्नू और चिराग एक-दूसरे को कुछ पल तक बस देखते ही रहे, मानो उस देखने भर से पूरे दिन की सारी घबराहट पल भर में खत्म हो गई हो। तन्नू को ऐसा महसूस हुआ जैसे उसकी पूरी दुनिया उसके सामने आ गई हो, जैसे पहली बारिश के आने से धरती की प्रतीक्षा पूरी हो गई हो। जैसे बसंत के आने पर कोयल की मधुर आवाज कानों में गूंजने लगी हो। ऐसा लग रहा था मानो नदियां खुद चलकर समुद्र से मिलने आ गई हों। ऐसा लग रहा था जैसे पुरवाई खुद चलकर दिल को सुकून देने आई हो। ऐसा लग रहा था मानो दोनों बस एक-दूसरे को निहारते ही रहें।

मगर तन्नू थोड़ा सा गुस्सा जैसा दिखावा करके अंदर गई और ना बोलने का नाटक करने लगी। उधर चिराग अपनी मां से मिला और बोला, "मां, क्या प्लान है आज शाम का?" तो मां ने कहा, "बेटा, तुम जानो, जैसे करना है करो।" आखिरकार शाम को केक काटा गया और महिला संगीत हुआ। उसके बाद चिराग ने तन्नू से कहा, "मुझे माफ़ करना तन्नू, मगर ये सब मैंने जानबूझकर किया क्योंकि मुझे तुम्हारा प्यार भरा गुस्सा और दिन भर का इंतजार कैसा होता है, वो देखना था। और हां, तन्नू, में इस बार भी कोई गिफ्ट नहीं दे पाउँगा तुम्हे तो पता है पैसे का वो बस आता तो है मगर जाने के लिए, इसलिए मैं तुम्हारे लिए कोई गिफ्ट नहीं ला सका, मुझे माफ़ करना।"

इस बार तन्नू का गुस्सा ठंडा हुआ और फफक फफक के रोने लगी और के चिराग से लिपट गई और बोली, आपको लगता है हमें आपके अलावा किसी गिफ्ट की जरूरत है? आप हमारे लिए उपरवाले की सबसे बड़ी गिफ्ट हो।

मगर फिर भी हमें आपसे कुछ गिफ्ट चाहिए। अब चिराग थोड़ा सा संकोच में पड़ गया और रुके हुए मन से बोला, "हां तन्नू, बताओ।" इस पर तन्नूबोली, "टेंशन मत लो, हमें आपसे पैसे वाला नहीं, फ्री वाला गिफ्ट चाहिए।"

चिराग ने कहा, "बोलो," इस पर तन्नू बोली, "इस शादी की सालगिरह पर हमें एक वादा चाहिए, आप आगे से ऐसा नहीं करोगे। बस इतना कर दो हमारे लिए।"

चिराग हल्का सा मुस्कराया और तन्नू के आंसू पोछते हुए बोला, "कभी नहीं, ऐसा कभी नहीं करूंगा। इस बार माफ कर दो।"

और दोनों फिर से एक-दूसरे के गले लग गए। 

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