बंधन - जीवन के

ऑफिस में अच्छे से डांट खाने के बाद जब बॉस ने वहां से भगा दिया, तो मन में सिर्फ यही बात चल रही थी कि बस, अब और नहीं। जाकर अभी रेजिग्नेशन देता हूं, क्योंकि अब कुछ ज़्यादा ही हो गया। अब यहाँ पर रहने का कोई मतलब नहीं, मेरी भी ज़िंदगी है। ऐसे ही डांट खाने के लिए नहीं है। सोचते-सोचते कब अपनी सीट पर गया और मेल में रिज़िग्नेशन टाइप कर भी दिया मगर तभी , होश आया और मानो एक झटका सा लगा हो। अरे, ये मैं क्या कर रहा हूँ? अगर मैं रिज़ाइन देता हूँ तो फैमिली का क्या होगा, माँ-बाप का क्या होगा, बच्चे जो स्कूल जा रहे हैं,  उनका क्या होगा। ये तो वैसे वैसा ही लगने लगा, जैसे ध्रुव जी महाराज ने पुरे संसार की ऑक्सीजन रोक ली हो और एक अजीब छटपटाहट होने लग गई | जो थोड़ी सी खुशी थी रिज़ाइन देकर मुक्त होने की, वो अब बंधन में बदल गई। 


बंधन एक ऐसा शब्द जो सुनने में थोड़ा धार्मिक सा लगता है, मगर जो इसमें जी रहा है, उससे अगर पूछा जाए तो वही इसका स्वाद बता सकता है। बंधन शब्द को सुनकर अमूमन तो पीछे से बैकग्राउंड में 'बंधन तो प्यार का बंधन है' करन अर्जुन फिल्म का गाना बजने लगता है। एक मदहोशी सी छाने लगती है, ऐसा लगता है जैसे किसी प्रेमिका का पल्लू अभी मेरे कोमल चेहरे के ऊपर से गुजर रहा हो और मैं उसे प्यार से पकड़ रहा हूँ। गन्ने के रस से भी मीठा, मगर जो जी रहा है उसके लिए ये पटना की मिर्च से भी तीखा, समंदर के पानी से भी खारा, और साइट्रिक अम्ल से भी खट्टा होता है। हाँ, ये, जरूर है कि कुछ बंधन थोड़े मीठे लगते हैं, उनका स्वाद थोड़ा मगर वो भी चैरी की तरह होता है ज्यादा खट्टा, ज्यादा मीठा। मगर बंधन तो बंधन ही है, फिर वो चाहे मीठा हो या खट्टा। 

बात अगर बंधन की जाए तो करोड़ों लोगों में से कोई एक ही हो सकता है जो इससे मुक्त हो सकता है। बाकी की सारी दुनिया इसी की नाज़ुक डोर से बंधी है, फिर वो चाहे हाथी हो या शेर या मनुष्य। कुछ हैं जो अपने पंखों से उड़ रहे हैं, मगर ज्यादातर लोग पृथ्वी पर आज भी बंधन से बंधे हुए हैं। एक हाथी छोटी सी खूंटी के बंधन से ऐसे बंध जाता है मानो कि ये उसके लिए किसी बरगद के वृक्ष का जड़ हो। 

हर एक जीव अपने बंधन से बंधा है, फिर वो चाहे कर्म बंधन हो या धर्म बंधन या सुख-दुख के जो भी बंधन हैं, सबसे बंधा है और अपनी जिंदगी को मुर्दों की तरह जी रहा है। सिर्फ बंधन के लिए लोग जिंदगी को जीना भूल गए हैं। हाँ, हुए हैं कुछ कबीर, दादू, नानक जो इस बंधन से मुक्त हो गए हैं, मगर वो भी कितने लोग? इस पृथ्वी पर अब तक जाने कितने करोड़ लोग हो गए हैं, जो कि अभी तक सिर्फ बंधन से ही बंधे हुए हैं। मुक्त होने वाले लोग एक मुट्ठी भर भी नहीं हैं। 

देखा जाए तो इसमें दोष किसी को नहीं दिया जा सकता है क्योंकि जो हमारे माँ-बाप ने जिया, वो उनके माँ-बाप ने भी जिया है। इसलिए परंपरा ही ऐसी है कि ये टूट नहीं सकती है। मैंने सुना है कि सर्पिनी 100 बच्चों को जन्म देती है और एक गोलाकार (कोड़ी) बना लेती है, जो उसमें से रेंगकर बाहर निकल जाता है वो ही बच पाता है, बाकी को वो खुद खा जाती है। बिल्कुल ऐसा ही संसार सागर है, ऐसा ही बंधन है जो इसमें से निकल गया वो ही जी सकता है, नहीं तो यहाँ पर गिरकर वो सिर्फ बंधन का ही हो जाता है। 

बचपन से बस्ते का बंधन, उसके बाद जॉब का बंधन, और उसके बाद शादी, बच्चों का बंधन। हाँ, वो अलग बात है कि कुछ दिन के लिए ये बंधन चंद खुशी लाता है, मगर वो हमेशा के लिए नहीं होती है। वो समय के साथ फीकी पड़ जाती है। 

मैंने सुना है कि किसी नौजवान की शादी होने जा रही थी, तो पंडित जी बोल रहे थे कि अब आप दोनों शादी के "बंधन" में बंध गए हैं। वहीं से एक फ़कीर गुजर रहा था अपने मस्ती में, उसके कानों में जैसे ही ये शब्द पड़ा, वो भागा और बोला, "नहीं, मत बाँधो, ये बहुत खतरनाक है। मत बाँधो, मत बाँधो!" मगर सुनता कौन है इस संसार में किसी की? बड़े मजे की बात तो ये है कि जो इसमें बंध गए हैं वो मुक्त होना चाहते हैं, और जो अभी मुक्त हैं वो बंधना चाहते हैं। चाहत ही तो बंधन का कारण है। चाहत के बिना बंधन बिल्कुल बेकार है, चाहत ही बंधन से बांधती है। 

मैंने सुना है कि एक जंगल में एक भेड़िया रहता था। उसकी चाहत थी कि अब ये परंपरा टूटनी चाहिए। आखिर किसी भेड़िए को भी तो सरदार होना चाहिए। और उसने घोषणा कर दी, "अब जंगल का सरदार मैं हूँ!"

उसने सोचा कि सिर्फ शेर को ही राजा क्यों माना जाए? भेड़िया भी तो ताकतवर होते हैं। उसके मन में आया कि अब समय गया है जब भेड़िए भी अपनी ताकत का प्रदर्शन करें और जंगल में अपनी पहचान बनाएं।

वो सीना तान कर, पूरे आत्मविश्वास के साथ जंगल के बीचों-बीच खड़ा हुआ और ज़ोर से चिल्लाया, "अब से मैं जंगल का सरदार हूँ! कोई शेर नहीं, कोई बाघ नहीं, सिर्फ भेड़िए का राज चलेगा यहाँ!"

उसकी आवाज़ जंगल में गूंज गई। कुछ भेड़िए तो उसकी बात से सहमत हो गए, क्योंकि उन्हें लगा कि उनका समय गया है। लेकिन बाकी जानवर चुपचाप देखते रहे, क्योंकि वे जानते थे कि जंगल में सरदार बनने का मतलब क्या होता है। जंगल के नियम इतने आसान नहीं थे कि कोई भी बस खड़े होकर खुद को सरदार घोषित कर दे।

शेर ने जब ये घोषणा सुनी तो वह भी गुस्से से भर गया। शेर ने सोचा, किसी भेड़िए की हिम्मत कैसे हुई ये कहने की कि अब जंगल का राजा वही होगाऔर फिर शेर जंगल के बीचों-बीच आया, जहाँ भेड़िया खड़ा था।

शेर ने अपनी दहाड़ से पूरा जंगल हिला दिया। भेड़िए की हिम्मत जवाब देने लगी, क्योंकि वो जानता था कि शेर के सामने उसकी ताकत कुछ भी नहीं है। शेर ने उसे घूरते हुए कहा, "सरदार बनने की हिम्मत तो कर ली, पर इसकी कीमत भी चुकानी पड़ेगी!

और इस तरह भेड़िया जो बंधन से मुक्त होकर सरदार बनने की कोशिश कर रहा था, उसे अपनी हिम्मत की कीमत चुकानी पड़ी। परंपरा तोड़ने की चाहत में उसे ये समझ नहीं आया कि जंगल में सरदार बनने का मतलब सिर्फ ताकत नहीं, बल्कि वो सम्मान और डर भी है, जो सदियों से शेर के नाम जुड़ा हुआ है।

हमारे
यहाँ पर बंधन में बांधने के लिए कुछ लोभी चीजें हैं जो लोभ से भरी हुई हैं। जैसे कि पढ़ लो बेटा, अच्छे मार्क्स आएंगे, इनाम मिलेगी, नौकरी लगेगी। 

शादी कर लो बेटा, बहू मिलेगी। बच्चे कर लो, आगे के लिए काम आएंगे। मतलब बंधन में बांधने के लिए अलग-अलग लालच हैं, जिनमें हम फंस जाते हैं। इस बंधन से मुक्त होने का एक ही उपाय है, वो है जागरूक होना। जागे कि सारे बंधन टूट गए। जागे कि सब मिट गया, सब गिर गया। गिर गया कहना ठीक नहीं है, गिरा हुआ ही है। बस जागने भर की देर है।

 

खुशियों की चाहत में अंधे हो गए,
लालच ही ऐसा था कि उसे छोड़ ना सके।
जिन पंखों के हौसलों से उड़ सकते थे,
आज चाहत के बंधन से छूट ना सके।

ये लालच ही था जिसने उन्हें बांध रखा,
स्वतंत्रता की राह में रोड़ा बन गया।
जो ऊंची उड़ान भर सकते थे अपने पंखों से,
वो अब बंधनों की जंजीरों में जकड़ गए।

ऋषि शर्मा 


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