अंतिम पत्र - The Last Latter


आज पत्र क्यों नहीं मिला? क्या हो गया उसे? कहीं कोई परेशानी तो नहीं? मन में अनेक तरह के ख्याल आ रहे थे। सोचते-सोचते घर पहुंचा और वही ख्याल मन में उमड़ने लगे कि आखिर हुआ क्या होगा।

गीता और अर्जुन की वह जगह, जहां वे अपने-अपने पत्र रख देते थे, याद आई। गांव का माहौल ही ऐसा होता है जहां हर कदम संभलकर रखना पड़ता है। अगर प्रेमिका रास्ते में मिल भी जाए तो देखना मुश्किल है, क्योंकि गांव में ना जाने कब कौन सी बात बन जाए। इसलिए बहुत ही समझदारी से रहना पड़ता है।

गीता और अर्जुन का मेल भी कुछ अलग ही था। दोनों की अच्छी जमती थी, लेकिन उन्होंने कभी किसी को यह जानने नहीं दिया कि उनके बीच कुछ है। पत्रों के आदान-प्रदान से ही बातें होती थीं। इसके अलावा उनके पास कोई और साधन नहीं था।

प्यार एक ऐसा शब्द है, जो लगता है कि इसके जैसा कोई और शब्द दुनिया में होगा ही नहीं। शायद ही दूसरा कोई शब्द बनाया गया हो ऐसा। इसमें ही सारे शब्द समाहित हैं, इसमें ही दुनिया समाहित है। इस शब्द में इतनी खुशी है कि किसी और शब्द में नहीं होगी। इसमें इतना दुख है कि शायद ही कहीं हो। यह इतना कीमती है कि सच्चा प्रेमी अपनी जान देकर भी खुश रहता है। इसमें इतना विश्वास होता है कि प्रेमी सब कुछ लुटा देता है, और इसमें इतना धोखा भी हो सकता है, जो और कहीं नहीं होता।


अर्जुन अपने ताने-बाने बुन रहा था, लेकिन उसे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। वह हर काम कर रहा था, लेकिन उसका मन किसी काम में नहीं लग रहा था। वह बार-बार उस जगह पर जाता, जहां पत्र मिलते थे। लेकिन वहां उसे कुछ नहीं मिला, तो मायूसी छा गई।


करीब एक हफ्ते बाद, उसे वहां पत्र मिला। वह रोने लगा। खुशी और दुख दोनों एक साथ प्रकट हो गए। खुशी इस बात की थी कि पत्र आ गया, जिसका इतना इंतजार था। और दुख इस बात का कि एक हफ्ते तक पत्र न आना, मतलब कुछ गलत जरूर हुआ है। कांपते हाथों से उसने पत्र लिया और उसे पढ़ने के लिए खोला। आंखों से आंसू बहने लगे। पत्र में लिखा था:


तुम्हारे नाम अंतिम पत्र


"कुछ समझ नहीं आ रहा कि कहां से शुरू करूं, कहां से नहीं। मैं जानती हूं, तुम वहां पत्र न पाकर बहुत परेशान हो रहे होगे। लेकिन सच मानो, मैं भी बहुत तड़प रही हूं। मेरे पास लिखने की हिम्मत नहीं हो रही थी।

तुम तो जानते हो, दुनिया का सत्य क्या है। यहां पर एक दिन सब कुछ राख हो जाता है, फिर चाहे वह कुछ भी हो। मेरा भी कुछ ऐसा ही है। मैंने तुमसे प्यार किया। तुम जैसा कोई शायद ही मुझे मिलेगा, जो मुझसे इतना प्यार करे। लेकिन समाज के अंतिम छोर तक अगर तुम देखोगे, तो जिंदगी वैसी नहीं होती जैसी हमें दिखती है। जिंदगी वह होती है, जो समाज हमें देता है।


हम क्या चाहते हैं, यह जरूरी नहीं। हमें क्या दिखाना है, यह जरूरी हो जाता है। प्यार भी कुछ ऐसा ही है। जीवन का साथी आत्मा से मिले, यह समाज में नहीं चल सकता। समाज में देह जरूरी है। जिसे देखने को आंखें तरस जाती हों, वह जरूरी नहीं है। जरूरी वह है, जिसके सामने तुम्हें रहना ही होगा, फिर चाहे वे आंखें तुम्हें पसंद हों या न हों।


जिसकी छाया में रहकर तुम आकाश को छोटा मान लेते हो, वह जरूरी नहीं। जरूरी है, तुम्हें एक छत देना। जरूरी यह नहीं कि तुम समुद्र में डुबकी लगा रहे हो। जरूरी यह है कि तुम्हें कुएं का मेढ़क बनाना। हमारी आंखों से कोई देखे तो दुनिया अलग दिखेगी, लेकिन समाज कभी भी तुम्हारी आंखों से देखना नहीं चाहेगा। उसे अपनी आंखों पर पूरा भरोसा है, और वह वही करती है जो उसे दिखता है। 

तुम जानते हो, तुम्हारे पत्रों में मुझे पूरी दुनिया दिख जाती थी। उसकी खुशबू से मेरा मन ऐसा महक उठता था, जैसे पूरबिया हवा का झोंका मेरे बालों को सहला गया हो। जैसे बारिश के मौसम में बूंदों के गिरने के बाद बहने वाली सौंधी खुशबू, मानो तुमने इंद्रदेव से कोई खास संदेश भिजवाया हो।

टप-टप करके पेड़ों के पत्तों से गिरती वो बूंदें हर पल तुम्हारी याद दिला देती थीं। तुम्हारे पत्र को पढ़ते हुए, उसमें तुम्हारा चेहरा झलकता और मेरा मन मोह लेता था। मैं कभी कहीं गई नहीं, मगर तुम्हारे पत्रों के जरिये गंगा जैसी पवित्र धारा मेरे मन में बहती रहती थी।

तुम्हारे पत्रों में मुझे पूरा संसार दिखाई देता था। जब भी मन उदास होता, तुम्हारे पत्रों को ही तुम्हारा कंधा समझकर मैं रो लेती थी। जब भी मेरा मन खुश होने का करता, तुम्हारे पत्र मेरे सहारे बन जाते थे।

तुम्हारे पत्रों ने मुझे जीवन का हर वह पहलू जीना सिखाया, जिसे मैं कभी महसूस भी नहीं कर सकती थी। उनमें एक दुनिया बसती थी, जिसमें मैं खुद को सबसे ज्यादा संपूर्ण पाती थी। तुमसे दूर होकर भी तुम्हारे शब्दों में हर पल तुम्हें अपने पास महसूस करती थी।

अब तक तो तुम समझ ही गए होगे कि मैं क्या कहना चाहती हूं। इसलिए अंत में कहना चाहती हूं, अपना ख्याल रखना और अब किसी पत्र की तलाश मत करना। यह अंतिम पत्र है।


वो भी मनुष्य होगा, मगर तुम जैसा नहीं तो सब बेकार है।

ढोल भी होंगे, बाराती भी होंगे, मगर तुम न होंगे तो सब बेकार है।

फेरे भी होंगे, पंडित भी होगा, मगर तुम न होंगे तो सब बेकार है।

आंसू भी होंगे, तड़प भी होगी, मगर तुम न होंगे तो सब बेकार है।

मिलन भी होगा तन से तन का, मगर मन के मिलन बिन सब बेकार है।

सब बेकार है... सब बेकार है... सब बेकार है...


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