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सफर |

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  स फर एक उर्दू का शब्द है , जिसका मतलब होता है रास्ता । मंज़िल अभी तक नहीं मिली है , मगर हम उसे पाने के लिए चल रहे हैं। पता नहीं कब मिलेगी , लेकिन हम अभी भी सफर में हैं। सफर में कुछ भी हो सकता है — कुछ भी पा सकते हैं , कुछ भी मिल सकता है , और कुछ भी कर सकते हैं। मगर , हकीकत यह है कि हम अभी भी सफर में ही हैं। जैसे गंगा और यमुना हिमालय से निकलती हैं और वहीं से उनका सफर शुरू होता है , मगर वे अपनी मंज़िल की तलाश में पता नहीं कहाँ - कहाँ चलती हैं , और कितने नदियाँ और नाले उनमें शामिल होते हैं। वे छोटी - छोटी नदियों को साथ लेकर चलती हैं , मगर सफर तब तक जारी रहता है जब तक वे समुद्र में न गिर जाएँ। शायद हमें यही तक पता है कि समुद्र में गिरने के बाद वे अपनी मंज़िल पर पहुँच गईं , लेकिन ऐसा नहीं है। क्योंकि समुद्र में गर्मी बढ़ती है , फिर ज्वार - भाटा आता है , और वह पानी भाप बन जाता है। उसके बाद फिर से वह बरसता है और सफर फिर ...