सफर |
सफर एक उर्दू का शब्द है, जिसका मतलब होता है रास्ता। मंज़िल अभी तक नहीं मिली है, मगर हम उसे पाने के लिए चल रहे हैं। पता नहीं कब मिलेगी, लेकिन हम अभी भी सफर में हैं। सफर में कुछ भी हो सकता है—कुछ भी पा सकते हैं, कुछ भी मिल सकता है, और कुछ भी कर सकते हैं। मगर, हकीकत यह है कि हम अभी भी सफर में ही हैं।
जैसे
गंगा और यमुना हिमालय
से निकलती हैं और वहीं
से उनका सफर शुरू
होता है, मगर वे
अपनी मंज़िल की तलाश में
पता नहीं कहाँ-कहाँ
चलती हैं, और कितने
नदियाँ और नाले उनमें
शामिल होते हैं। वे
छोटी-छोटी नदियों को
साथ लेकर चलती हैं,
मगर सफर तब तक
जारी रहता है जब
तक वे समुद्र में
न गिर जाएँ। शायद
हमें यही तक पता
है कि समुद्र में
गिरने के बाद वे
अपनी मंज़िल पर पहुँच गईं,
लेकिन ऐसा नहीं है।
क्योंकि समुद्र में गर्मी बढ़ती
है, फिर ज्वार-भाटा
आता है, और वह
पानी भाप बन जाता
है। उसके बाद फिर
से वह बरसता है
और सफर फिर से
शुरू हो जाता है।
मानव
का जीवन भी कुछ
ऐसा ही है। वह
हमेशा से सफर में
रहता है, मगर सफर
में बहुत कुछ मिलता
है जिससे संतुष्टि मिलती है, मगर कुछ
दिनों बाद फिर से
वही सफर शुरू हो
जाता है, क्योंकि वह
मंज़िल नहीं होती।
पैदा
होने के बाद ही
सफर की शुरुआत हो
जाती है। बचपन में
खिलौने हमारे सफर का हिस्सा
बनते हैं। उन्होंने हमारा
साथ दिया, हमें खुशी दी।
दुनिया के बारे में
अभी कुछ नहीं पता
होता, बस सफर में
होते हैं और खिलौने
हमारे हमसफर होते हैं, और
कुछ नहीं पता होता।
शिक्षा
प्राप्त करने के लिए
किताबें हमारे हमसफर बन जाती हैं।
उन्हीं को हमने अपना
साथी बनाया और उन्हीं के
सहारे हमने अपना सफर
तय किया। मगर वे भी
अभी हमारा ठहराव न बन पाईं,
क्योंकि किताबों को हमने अपने
नौकरी का जरिया बनाया
है, न कि अपनी
मंज़िल।
सोचा
कि नौकरी ही हमारी मंज़िल
बनेगी, मगर नहीं, वह
भी तो एक सफर
बनकर रह गई। सुबह
का जागना और जीवन के
लिए सब कुछ छोड़कर
दो जून की रोटी के लिए भागना। मंज़िल क्या है, कुछ
नहीं पता। पत्नी और
बच्चों के लिए सब
कुछ छोड़कर बस वही करना
जो दिख रहा है।
क्या रिश्ते, क्या नाते, क्या
दोस्ती, क्या यारी, कुछ
भी तो नहीं पता,
क्योंकि सफर में हैं
और सब हमसफर बने
हुए हैं। कभी-कभी
रोटी मिली, कभी फर्श पर
ही सो गए, मगर
हमें अभी नहीं पता
कि मंज़िल कब मिलेगी, क्योंकि
हम अभी भी सफर
में हैं।
जीवन
में जो इकट्ठा किया,
वह हमारे बुढ़ापे के साथ ही
धुंधला पड़ने लगा। सोचा कि
मंज़िल होगी, मगर नहीं, वह
भी तो सफर ही
था। हर उम्र के
साथ हमारे शौक बदल गए,
मंज़िल नहीं मिली, क्योंकि
जिस सांप को रस्सी समझ रहे थे, वह सिsर्फ साँप
ही था, मंज़िल नहीं।
सफर में यही होता
है। हर किसी को
अपना समझ लिया—या
तो वह दोस्त बना
या फिर दुश्मन। इसके
सिवा कुछ नहीं समझा।
घर को अपना दोस्त
समझा, वह तो बच्चों
का हो गया। जिस
घर के लिए इतना
लंबा सफर तय किया
था, वह तो आज
किसी और का हो
गया। जैसे एक ट्रेन
चलती है और उसकी
पटरी के किनारे लगे हुए जो पेड़ होते हैं, वह ट्रेन के
चलने से छूट जाते
हैं, वैसे ही जीवन
की पटरी पर जो
ट्रेन चल रही है,
उसकी हर एक सांस
के साथ सब कुछ
छूटता जा रहा है,
मगर वह मंज़िल नहीं
है जो मिलनी चाहिए।
और अंत में जब
मृत्यु हो जाती है,
उसके बाद फिर एक
लंबे रास्ते पर चलने लगते
हैं, उसके बाद फिर
वही सफर शुरू हो
जाता है, जिसे हम
छोड़कर आए थे। बस
चेहरे बदल जाते हैं।
इसलिए
सिर्फ राम को मंज़िल बनाओगे तो शायद पहुंच जाओगे, मगर जिसे आप मंज़िल मानकर चल रहे हैं, वह सिर्फ एक सफर है।


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