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Showing posts from September, 2024

JOB

  हर रोज मैं खुद से ही लड़कर , मन मार काम पर जाता हूँ , दिन भर करता काम मगर , खुश नहीं रह पाता हूँ। खटपट , किट - किट , लंच और चाय , सब में शांत - सा रहता हूँ , डांट है पड़ती जब बॉस की , जख्मी - सा हो जाता हूँ। कब छूटेगा पीछा मेरा , सोच रोज मैं करता हूँ , थक - हार कर घर आता , फिर वही रोज़ दोहराता हूँ। क्या होगा अब इस जीवन का , सोच भी मेरी हारी है , सुकून की एक छाया में , अब मैं सोना चाहता हूँ। हर रोज मैं खुद से ही लड़कर , काम पर जाता हूँ , दिन भर करता काम मगर , खुश नहीं रह पाता हूँ। वक़्त से पहले चिंता करके , पक गए अब बाल हमारे , मेरे संग खेलने को तो , रोते हैं बालक बेचारे। क्यूँ छुट्टी नहीं लेते हो तुम ? करते रोज शिकायत मुझसे , कैसे कहूँ मैं हूँ दिहाड़ी , रोज़ कमाने जाता हूँ। फुर्सत के पल ढूंढने को , अब भी मैं मरता हूँ। हर रोज मैं खुद से ही लड़कर , काम पर जाता हूँ , दिन भर करता काम मगर , खुश नहीं रह पाता हूँ।

बंधन - जीवन के

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ऑफिस में अच्छे से डांट खाने के बाद जब बॉस ने वहां से भगा दिया , तो मन में सिर्फ यही बात चल रही थी कि बस , अब और नहीं। जाकर अभी रेजिग्नेशन देता हूं , क्योंकि अब कुछ ज़्यादा ही हो गया। अब यहाँ पर रहने का कोई मतलब नहीं , मेरी भी ज़िंदगी है। ऐसे ही डांट खाने के लिए नहीं है। सोचते - सोचते कब अपनी सीट पर आ गया और मेल में रिज़िग्नेशन टाइप कर भी दिया मगर तभी  , होश आया और मानो एक झटका सा लगा हो। अरे , ये मैं क्या कर रहा हूँ ? अगर मैं रिज़ाइन देता हूँ तो फैमिली का क्या होगा , माँ - बाप का क्या होगा , बच्चे  जो स्कूल जा रहे हैं,  उनका क्या होगा। ये तो वैसे  वैसा ही लगने लगा,  जैसे   ध्रुव जी महाराज ने  पुरे संसार की  ऑक्सीजन रोक ली हो और एक अजीब छटपटाहट होने लग गई |  जो थोड़ी सी खुशी थी रिज़ाइन देकर मुक्त होने की , वो अब बंधन में बदल गई।   बंधन एक ऐसा शब्द जो सुनने में थोड़ा धार्मिक सा लगता है , मगर जो इसमें जी रहा ...