JOB
हर रोज मैं खुद से ही लड़कर , मन मार काम पर जाता हूँ , दिन भर करता काम मगर , खुश नहीं रह पाता हूँ। खटपट , किट - किट , लंच और चाय , सब में शांत - सा रहता हूँ , डांट है पड़ती जब बॉस की , जख्मी - सा हो जाता हूँ। कब छूटेगा पीछा मेरा , सोच रोज मैं करता हूँ , थक - हार कर घर आता , फिर वही रोज़ दोहराता हूँ। क्या होगा अब इस जीवन का , सोच भी मेरी हारी है , सुकून की एक छाया में , अब मैं सोना चाहता हूँ। हर रोज मैं खुद से ही लड़कर , काम पर जाता हूँ , दिन भर करता काम मगर , खुश नहीं रह पाता हूँ। वक़्त से पहले चिंता करके , पक गए अब बाल हमारे , मेरे संग खेलने को तो , रोते हैं बालक बेचारे। क्यूँ छुट्टी नहीं लेते हो तुम ? करते रोज शिकायत मुझसे , कैसे कहूँ मैं हूँ दिहाड़ी , रोज़ कमाने जाता हूँ। फुर्सत के पल ढूंढने को , अब भी मैं मरता हूँ। हर रोज मैं खुद से ही लड़कर , काम पर जाता हूँ , दिन भर करता काम मगर , खुश नहीं रह पाता हूँ।