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शादी की सालग्रह

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  तन्नू आज सुबह से ही चहक रही थी। उसके कदम रोज़ से कुछ ज्यादा ही हल्के लग रहे थे। वह कुछ गुनगुना रही थी और अपने काम में भी कुछ ज्यादा ही मन लगा रही थी। अभी सुबह का सूरज भी पूरी तरह नहीं उगा था, मगर उसकी हल्की-हल्की लाली ज़मीन पर फैल रही थी। उधर तन्नू के मन के अंदर भी एक तरह का संगीत बज रहा था, जैसे मन का संगीत और भोर की रोशनी आपस में मिल रहे हों। जैसे समुद्र का ज्वार-भाटा अचानक शांत हो गया हो। तन्नू को ऐसा लग रहा था जैसे सपनों की खिड़की पर प्यार की हवा ने दस्तक दे दी हो और कह रही हो, "आज तुम बहुत खुश हो, मुझे भी बताओ, क्या हुआ है।" ये सब उसके मन के ताने-बाने थे। कभी-कभी तन्नू अपना फोन उठाती और सोचती, "अभी तो चिराग जी सो रहे होंगे, थोड़ी देर में कॉल करते हैं," लेकिन फिर काम में लग जाती। पर थोड़ी देर बाद फिर से फोन के पास आकर देखती और सोचती, "अभी नहीं।" बस, ऐसे ही उलझन में समय बीत रहा था। दरअसल आज का दिन उनके लिए खास था। तन्नू और चिराग की शादी की सालगिरह थी। चिराग एक प्राइवेट कंपनी में छोटी सी नौकरी करता था। वह महीने में सिर्फ दो दिन गांव आता और सभी से मिल...