जो देखा सो कित्ता - घर घर की कहानी |
सोचा था कि अपनी ज़िंदगी ठीक से कट जाएगी मगर नहीं, अगर हम चैन से जीएंगे तो इन्हें शांति कहाँ मिलेगी? वैसे दिन भर हाथ में माला लेकर भजन करती फिरती है, मगर क्या फायदा ऐसे भजन का जो अपने बच्चों को चैन से न जीने दे?
हमारा तो नसीब ही खराब है। कल तो गुप्ताइन भी कह रहे थी कि आपकी सास को आए हुए यहाँ पर पूरे 15 दिन हो गए, कब जा रही हैं? तो मैंने कहा, "क्या बताऊं, गुप्ताइन? बुढ़िया मेरे सर पर ऐसे बैठ गई हैं, लगता है, कि वो जाने वाली नहीं हैं, मेरे तो हालात ही खराब कर देती हैं। ससुर तो कहाँ के गुजरे, ये बुढ़िया हमारे सर पर बैठ गई। मैं तो अच्छी-भली रह रही थी, बच्चे और पति के साथ, मगर नहीं, भगवान से मेरा सुख देखा नहीं गया। ससुर के साथ ही बुढ़िया निपट जाती तो अच्छा होता।।
इतना सब कहने के बाद दोनों माँ-बेटी बाहर चली गईं और बेटी इंस्टा पर रील बनाने लगी और निशा अपनी लेडीज पार्टी में।
दरअसल, सभी के पति बाहर नौकरी करते हैं और बच्चे स्कूल जाते हैं, उसके बाद एक जगह पर महिला मंडल की समिति चेयर लेकर बैठ जाती है गपशप करने के लिए। कभी-कभी तो चेयर कम पड़ जाती है, कुछ घर के सामने रैम्प बना होता है वहां पर बैठकर गपशप लड़ती है। जैसे सोनक जी महाराज सनकादिक मुनि और अन्य ऋषियों के लिए कथा सुनाते हैं वैसे ये महिला मंडल कथा सुनाते हैं। एक बोलती है और दूसरी सुनती है। इनकी कहानी ज़्यादा बाहर की नहीं, सिर्फ़ अपनी कॉलोनी के आस पास घूमती है। उसमें प्रैंक जैसे हालात बनाए जाते हैं, जैसे देख लिया जाता है कि आज कौन अनुपस्थित है। बस फिर क्या उसी को लेकर बात बनाई जाती है। जैसे ही वो आती है,तो उसके सामने में ये महिला मंडल हँस कर बोलता है, "आपके बारे में ही बात हो रही थी, मगर बात क्या हुई थी, ये नहीं बताते हैं।" और जो आई हुई महिला वह खुश हो जाती है, "चलो मेरे बारे में तो बात हुई, मगर इस बात से वह अनभिग्य होती है कि बात आखिर क्या हुई थी।
अच्छा, इनके घर आने के लिए कोई भी एलाउ नहीं है, जैसे की पहले होता था "अतिथि देवो भवः" वो कुछ 10 साल पहले था मगर अब नहीं, अब तो अपने मायके वालों के लिए भी नहीं और ससुराल वालों के लिए भी नहीं, अगर किसी को आना है 2-4 घंटे रुके तो "देव" तुल्य है मगर अगर वह रात के लिए रुक गया तो समझो उसका दूसरे दिन महिला मंडल कमेटी में प्रैंक होना ही होना है, वो बातें फिर इस प्रकार की होती हैं।
ए मिसिराइन, सुनो, कल गरगाइन के घर इनके गेस्ट आए थे, हाहाहाहा।
गरगाइन - हाँ ले लो मजे, आज तुम लोगों को मौका जो मिल गया।
क्या बताऊं, बहिन, हालत खराब हो गई, 2 बार खाना नास्ता चाय , ये मान लो जीना दुभर हो गया। और एक तो ऐसे बहिन, क्या बताऊं कि बाथरूम में गए और पैर नहीं धोए, अभी रजाई गद्दा सबको धोकर सुखाया है, घर में फिनाइल से पोछा लगाया है, तब सब नहाए हैं, बेड पर गंगाजल छिड़का है, गेट धोया है, तब जाकर के थोड़ा सा चैन मिला है। रात मुझे इतने भारी पड़ गयी जैसे मंदोदरी को युद्ध की रात, यही रात अंतिम, यही रात बाकी, ये तो उन्हें बोल रहे थे कि खाना खाकर जाना, मगर मैंने इन्हें हड़का दिया कि होटल से ले आना, तब जाकर गए वो लोग।
फिर ठहाका लगता है और बच्चों की वैन आ जाती है, उसके बाद सब अपने घरों में जाती है।
मेरी चाय पूरा होते होते सोचने लगता हूँ कि क्या हो गया है हमारी सोसायटी को, क्या होगा जिस देश में "बसुदेव कुटुम्बकम" बोला था, "अतिथि देवो भव" बोला जाता था, आज वहां के हालात ऐसे हैं कि सास और ससुर के लिए रहने का ठिकाना नहीं है, कुत्ता घर में है मगर इंसान नहीं, और आने वाले समय में ये हालात कुछ ज्यादा ही बढ़ेंगे , उस समय पर क्या होगा? मैंने सुना है कि जो माँ-बाप करते हैं वही बच्चे सीखते हैं, तो आगे आने वाले समय में हमारे बच्चे भी कुछ ऐसा ही करेंगे। मुझे लगता है भगवान ने इंसान की उम्र इसलिए छोटी कर दी है कि बुढ़ापा आए ही नहीं।
टूटकर रिश्ते आज ऐसे बिखरे हैं, है सब कुछ पास अपने, मगर अपने ही नहीं हैं। माँ-बाप हैं तुम्हारे, मेरे थोड़ी हैं, ये कहने वाली औरत आज घर-घर में है।
थे वे गरीब मगर रिश्ते अमीर होते थे,
सुख-दुःख में हमेशा साथ होते थे।
आज रिश्ता वह पत्ता बन गया है,
जहाँ पेड़ तो है मगर जड़ खत्म है।
सफेदी बालों में है, आँखों में है धुंधलापन
दाँत भी साथ छोड़ गए, चमड़ी में आया है कालापन।
जिन आँखों से न जाने कितने उगते सूरज देखे,
अब आ रहे हैं उनके डूबने के दिन।
देख लिया कैसे वक्त ने पासा पलटा है,
छोड़ रहे हैं अपने ही, जिनके लिए जीवन जीया।
समय की मार भी कितनी बड़ी हो गई,
अपनों ने ही साथ छोड़ दिया।
कैसे समझाऊँ मैं तुम्हें ये वक्त की तकाज़ा ,
जो तुम बो रहे हो, वही तुम्हें पड़ेगा काटना।

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